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श्री शंकराजार्य जी

मूल जगद्‌गुरु परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य को सर्वप्रथम जगद्‌गुरु माना जाता है । इनका इस जगत में अवतरण २५०० वर्ष पूर्व हुआ । सनातन वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार, वैदिक धर्म पालन हेतु प्रत्साहन एवं भ्रामक धार्मिक प्रचारों का निर्मूलन ही उनके अवतरण का उद्देश्य था। इनका दर्शन अद्वैतवाद कहलाता है, जो ज्ञान मार्ग का पथप्रदर्शन करता है ।
उनके सिद्धांत के अनुसार भगवान निराकार और अकर्ता हैं । इन्होंने यह भी बताया कि भगवान विशुद्ध और शाश्वत हैं, जो अपरिमेय ज्ञान और दिव्य आनन्द स्वरूप हैं। इन्होंने जगत को मिथ्या और जीव को भगवान और माया का संयुक्त परिणाम कहा है ।
इन्होंने वेद के अनोखे विवेचन के कारण स्वयं को ईश्वरवादी और अनिश्वरवादी के मध्य खड़ा किया, और एक समय ऐसा जान पड़ा कि ये ईश्वरवाद और अनिश्वरवाद दोनों के समर्थक हैं । इन्होंने यह कदम इसलिए लिया ताकि ये वे भविष्य में ईश्वरवादी आँदोलन की नींव रख सकें।

श्री माध्वाचार्य जी

श्री माध्वाचार्य जी इस धराधाम पर ७०० वर्ष पहले अवतरित हुए । वे द्वैतवाद दर्शन को मानने वाले थे । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भगवत्प्राप्ति ही जीव का एकमात्र लक्ष्य है । इन्होंने जीव, माया और ब्रह्म को तीन अलग-अलग तत्व बताया और ज़ोर देकर कहा कि यह भक्ति ही है, जो जीव को भगवत्प्राप्ति और मुक्ति दिला सकती है ।
इन्होंने कहा कि हमारे पिछले जन्म के कर्म के अनुसर ही हम वर्तमान जीवन प्राप्त करते हैं । हमें दुख-सुख किसी से भी नहीं प्रभावित होना चाहिए । हम हर प्रकार की परिस्थिति को हृदय से स्वीकार कर पाए, इसमें निरन्तर स्मरण सहायक सिद्ध होगा । भगवद् स्मरण, श्रवण, चिंतन और नाम-गुणगान से बढ़कर और कुछ भी नहीं है ।

श्री कृपालु जी महाराज…

आध्यात्मिक इतिहास में एक युगांतकारी घटना तब घटी जब श्री कृपालु जी महाराज ने ‘काशी विद्वत् परिषत्’, भारतीय आध्यात्मिक जगत के गणमान्य ५०० शीर्ष विद्वज्जन से सुशोभित मंडल के आमंत्रण पर अति गंभीर श्रृंखलाबद्ध व्याख्यान दिया । श्री महाराज जी निरंतर ९ दिनों तक समस्त वेद-शास्त्रों एवं पूर्व जगद्गुरुओं के दर्शनों का विस्मयकारी रहस्योद्घाटन विद्वज्जनों की भाषा संस्कृत में करते रहे । उन्होंने बड़ी सरलता से वेद-शास्त्र संबंधी विविध दर्शनों, मतों तथा पूर्व जगद्गुरुओं के दृष्टिकोण में विराधाभासी प्रतीत होने वाले तथ्यों का वास्तविक तात्पर्य प्रस्तुत करते हुए अति अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया और भगवत्प्राप्ति का सत्यपथ जीवमात्र के कल्याणार्थ मार्गदर्शित किया।
उनके व्याख्यान से चमत्कृत उन ५०० विद्वज्जनों एवं शास्त्रज्ञों का हृदय ऐसा मंत्रमुग्ध हो गया कि उन्होंने एक मत से इन्हें ‘जगद्गुरु’ घोषित करने की हार्दिक अभिलाषा व्यक्त की और सर्वसम्मति से उनसे यह पद स्वीकार करने की विनती की । फिर उन्होंने उन्हें गद्गद कंठ से ‘जगद्रुरूत्तम’ भी घोषित किया । ‘जगद्गुरूत्तम’ यानी समस्त जगद्गुरुओं में श्रेष्ठ । इसके अलावा उन्हें ‘भक्तियोगरसावतार’ यानी दिव्य प्रेम रूपी आनन्द-मकरन्द के साक्षात् अवतार आदि अन्य कई उपाधियों से भी विभूषित किया गया ।

श्री निम्बार्काचार्य जी

जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य का अवतरण ११वीं सदी में जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य के कुछ काल बाद हुआ । इनका दर्शन द्वैताद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है । उन्होंने यह शिक्षा दी कि हालाँकि भगवान और जीव में द्वैत है, किन्तु भगवान और जीव में एकत्व का संबंध भी है । भगवान का अंश होने के कारण जीव के अस्तित्व का उद्देश्य है- भगवत्कृपा प्राप्त करना और भगवत्प्राप्ति करना। साकार ब्रह्म की भक्ति में ही जीव का परम चरम आध्यात्मिक कल्याण निहित है । इन्होंने स्वयं को ईश्वर का दास बतलाया और श्रीराधाकृष्ण के प्रति सर्वभावेन समर्पण युक्त भक्ति का परिचय संसार को दिया ।

श्री रामानुजाचार्य जी

इनका अवतरण १००० वर्ष पूर्व हुआ था, इन्होंने आदि शंकराचार्य जी के अद्वैतवाद के विपर्यय में विशिष्टाद्वैतवाद को स्थापित किया । इनके अनुसार भगवान केवल रचयिता नहीं हैं, वरन् जगत के स्वामी हैं। वे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान हैं। वे असीम हैं । उन्होंने जीव को भगवान का अंश और उनका नित्य दास कहा । उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि भगवान सब जीवों के हृदय में साक्षी बनकर बैठे हैं । इन्होंने भक्तिमार्ग को ही केन्द्र-बिन्दु में रखा और घोषणा की कि यही भगवत्प्राप्ति का एकमात्र उपाय है । इन्होंने सब तरह की संसारी आसक्ति के त्याग, अहंकार के निर्मूलन, भगवन्नाम के प्रतिपल स्मरण और भगवत्सेवा हेतु परम व्याकुलता पर बहुत बल दिया। उन्होंने कहा कि भगवत्कृपा पाकर ही जीव दिव्य आनंद को प्राप्त कर सकता है ।