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बाल विकास शिविर

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बच्चों ! तुम हमारे भविष्य हो । पूरे संसार के भविष्य हो । तुम्हारे सुन्दर विकास से विश्व खुशहाल होगा । तुम्हारा सुन्दर संस्कार और व्यवहार तुम्हें सबका प्यारा बनाएगा । अच्छे संस्कार और अच्छे गुण किसी के अन्दर होना ही उसके अच्छे होने की पहचान है । इसके लिए तुम्हें अच्छे वातावरण में रहकर अच्छे गुण और संस्कार अपने अंदर डालने पड़ेंगे । अच्छे वातावरण में रहकर जब तुम बड़े होगे, तो तुम अच्छी बातें ही सोचोगे । जब तुम्हारे विचार अच्छे होंगे, तो तुम सदा अच्छे काम ही करोगे । पुस्तकें तुम्हें ज्ञान दे सकती हैं, पर जीवन के विभिन्न अवसरों पर तुम्हारी सोच और तुम्हारा व्यवहार ही यह बताएगा कि तुम उस ज्ञान का अपने जीवन में कितना उपयोग कर पाए हो ।

आज का वातावरण तुम्हें अवश्य ही धन, पद और यश दिला देगा, पर कोई भी बाहरी ज्ञान तुम्हें कभी न खत्म होने वाली जीवन की खुशियाँ नहीं दिला पाएगा । इसके लिए संपूर्ण रूप से विकास आवश्यक है। इसकी कमी तुम्हारे जीवन में दुख लाएगा इसलिए जीवन में आगे बढ़ने से पहले अपने आप को पहचाना जरूरी है। अपने अंदर छिपे सभी गुणों को बाहर आने का मौका देना आवश्यक है। साथ ही अपने अवगुणों को दूर करना भी ज़रूरी है।

तुम बच्चों के अन्दर इन सभी अच्छे गुणों के विकास करने तथा इन सबको देने वाले भगवान के लिए बहुत-बहुत प्यार भरने के लिए ही ४ अक्टूबर से ८ अक्टूबर तक पूजनीया माँ ने दार्जीलिंग में ‘बाल विकास शिविर’ का आयोजन करवाया था ।

Bal Sadhana Shivir

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बच्चों ! तुम हमारे भविष्य हो । पूरे संसार के भविष्य हो । तुम्हारे सुन्दर विकास से विश्व खुशहाल होगा । तुम्हारा सुन्दर संस्कार और व्यवहार तुम्हें सबका प्यारा बनाएगा । अच्छे संस्कार और अच्छे गुण किसी के अन्दर होना ही उसके अच्छे होने की पहचान है । इसके लिए तुम्हें अच्छे वातावरण में रहकर अच्छे गुण और संस्कार अपने अंदर डालने पड़ेंगे । अच्छे वातावरण में रहकर जब तुम बड़े होगे, तो तुम अच्छी बातें ही सोचोगे । जब तुम्हारे विचार अच्छे होंगे, तो तुम सदा अच्छे काम ही करोगे । पुस्तकें तुम्हें ज्ञान दे सकती हैं, पर जीवन के विभिन्न अवसरों पर तुम्हारी सोच और तुम्हारा व्यवहार ही यह बताएगा कि तुम उस ज्ञान का अपने जीवन में कितना उपयोग कर पाए हो ।

आज का वातावरण तुम्हें अवश्य ही धन, पद और यश दिला देगा, पर कोई भी बाहरी ज्ञान तुम्हें कभी न खत्म होने वाली जीवन की खुशियाँ नहीं दिला पाएगा । इसके लिए संपूर्ण रूप से विकास आवश्यक है। इसकी कमी तुम्हारे जीवन में दुख लाएगा इसलिए जीवन में आगे बढ़ने से पहले अपने आप को पहचाना जरूरी है। अपने अंदर छिपे सभी गुणों को बाहर आने का मौका देना आवश्यक है। साथ ही अपने अवगुणों को दूर करना भी ज़रूरी है।

तुम बच्चों के अन्दर इन सभी अच्छे गुणों के विकास करने तथा इन सबको देने वाले भगवान के लिए तुममें बहुत-बहुत प्यार भरने के लिए ही ४ अक्टूबर से ८ अक्टूबर तक पूजनीया माँ ने दार्जीलिंग में ‘बाल विकास शिविर’ का आयोजन करवाया था ।

बाल विकास शिविर, दार्जीलिंग (०४.१०.१६०८.१०.१६)

दार्जीलिंग वह सुन्दर स्थान है, जो बच्चों को बहुत भाता है । यहाँ की सुन्दर प्रकृति सबका मन मोह लेती है। बर्फ से ढकी कंचनजंगा की चोटियाँ, पर्वत पर बसा सुन्दर शहर, हरी-भरी चाय के सीढ़ीदार बागान, तरह-तरह के ऊँचे वृक्ष, पहाडियों पर सीटी बजती हिमालयन ट्वाय ट्रेन, कुछ भी बच्चे नहीं भूल पाते । जानते हो बच्चों ! वहाँ हर दिन सभी बच्चे सुबह-सुबह सैर पर जाते । वे दार्जीलिंग की सुन्दरता देखकर उसमें खो जाते औरपेड़-पौधे, जीव-जन्तु सबको भगवान का गुणगान सुनाकर बेहद खुश होते । बहुत सुन्दर जगह है यह दार्जीलिंग ! तुम सबको यहाँ आना चाहिए था ।यहाँ हर दिन पूज्या माँ बच्चों को ढेर सारी प्यारी-प्यारी सीख देती थीं । ये बच्चे रोज भगवान के गुणगान और प्रार्थना से अपना हर दिन शुरु करते थे । हर रोज सुबह-सुबह बच्चों को पूज्या माँ भगवान के नामगान के साथ एरोबिक सिखलातीं । इस ‘बाल विकास शिविर’ में हर दिन संगीत की कक्षा भी लगती थी । यहाँ प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ करता था । ‘बाल विकास शिविर’ में खेल के आयोजन ने बच्चों का खूब मनोरंजन किया और उन्हें खेल-खेल में सुन्दर संस्कार दिए गए ।एक दिन सभी चिड़ियाघर देखने के लिए गए । वहाँ उन्होंने तरह-तरह के पशु-पक्षियों को भी देखा । प्रतिदिन शाम ३.०० से ४.०० बजे का समय बच्चों के पिकनिक का होता था । एक दिन सबने दीपावली मनाई । इस अवसर पर बच्चों ने स्वयं अपने हाथों से सफाई और सजावट भी की । सबने अपने प्यारे श्री महाराज जी, अपनी प्यारी अम्मा जी, पूज्या माँ जी और पूज्य स्वामी जी के लिए ग्रीटिंग कार्ड्स बनाए । फिर दीप जलाए और यह जाना कि दीपावली क्यों मनाई जाती है ? इसे कैसे मनाना चाहिए ? साधना शिविर के खत्म होने तक बच्चे जान चुके थे कि अभी उन्हें बहुत कुछ करना है, अपने लिए, परिवार के लिए, देश के लिए और विश्व के लिए । प्यारे बच्चों ! तुम सब भी एक बार जरूर भाग लो ।

बाल विकास शिविर, दार्जीलिंग (०४.१०.१६-०८.१०.१६) :

दार्जीलिंग वह सुन्दर स्थान है, जो बच्चों को बहुत भाता है । यहाँ की सुन्दर प्रकृति सबका मन मोह लेती है। बर्फ से ढकी कंचनजंगा की चोटियाँ, पर्वत पर बसा सुन्दर शहर, हरी-भरी चाय के सीढ़ीदार बागान, तरह-तरह के ऊँचे वृक्ष, पहाडियों पर सीटी बजती हिमालयन ट्वाय ट्रेन, कुछ भी बच्चे नहीं भूल पाते । जानते हो बच्चों ! वहाँ हर दिन सभी बच्चे सुबह-सुबह सैर पर जाते । वे दार्जीलिंग की सुन्दरता देखकर उसमें खो जाते और पेड़-पौधे, जीव-जन्तु सबको भगवान का गुणगान सुनाकर बेहद खुश होते । बहुत सुन्दर जगह है यह दार्जीलिंग ! तुम सबको यहाँ आना चाहिए था । यहाँ हर दिन पूज्या माँ बच्चों को ढेर सारी प्यारी-प्यारी सीख देती थीं । ये बच्चे रोज भगवान के गुणगान और प्रार्थना से अपना हर दिन शुरु करते थे । हर रोज सुबह-सुबह बच्चों को पूज्या माँ भगवान के नामगान के साथ एरोबिक सिखलातीं । इस ‘बाल विकास शिविर’ में हर दिन संगीत की कक्षा भी लगती थी । यहाँ प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ करता था । ‘बाल विकास शिविर’ में खेल के आयोजन ने बच्चों का खूब मनोरंजन किया और उन्हें खेल-खेल में सुन्दर संस्कार दिए गए । एक दिन सभी चिड़ियाघर देखने के लिए गए । वहाँ उन्होंने तरह-तरह के पशु-पक्षियों को भी देखा । प्रतिदिन शाम ३.०० से ४.०० बजे का समय बच्चों के पिकनिक का होता था । एक दिन सबने दीपावली मनाई । इस अवसर पर बच्चों ने स्वयं अपने हाथों से सफाई और सजावट भी की । सबने अपने प्यारे श्री महाराज जी, अपनी प्यारी अम्मा जी, पूज्या माँ जी और पूज्य स्वामी जी के लिए ग्रीटिंग कार्ड्स बनाए । फिर दीप जलाए और यह जाना कि दीपावली क्यों मनाई जाती है ? इसे कैसे मनाना चाहिए ? साधना शिविर के खत्म होने तक बच्चे जान चुके थे कि अभी उन्हें बहुत कुछ करना है, अपने लिए, परिवार के लिए, देश के लिए और विश्व के लिए । प्यारे बच्चों ! तुम सब भी एक बार जरूर भाग लो ।

परोपकारी वृक्ष

एक थे राजा रणजीत सिंह । वे अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे । प्रजा भी उन्हें बहुत चाहती थी । वे अपने न्यायी और परोपकारी राजा की सदा प्रशंसा किया करते। एक बार की बात है । राजा को अपने राज्य का हालचाल जानने की इच्छा हुई । वे अपने मंत्री के साथ राज्य के दौरे पर निकले । लौटते समय अचानक एक पत्थर उनके सिर पर आ लगा । सिर पर गहरी चोट आई । मंत्री को यह देखकर बड़ा गुस्सा आया । पत्थर फेंकने वाले की खोज शुरु हो गई । तभी आसपास खड़े लोगों में से एक ने कहा- ‘‘पत्थर इस बुढ़िया ने फेंका है ।’’ उस वृद्ध महिला को पकड़ लिया गया । उसे राजा के सामने लाया गया । वह बहुत डरी हुई थी । राजा को उस पर दया आ गई । राजा ने सोचा- ‘‘मुझे इसकी बात ज़रूर सुननी चाहिए । भला एक वृद्धा को पत्थर चलाने की क्या ज़रूरत पड़ी ?’’ राजा ने कहा, ‘‘ डरो मत अम्मा ! यह बताओ कि तुमने पत्थर क्यों फेंका था ?’’ राजा की बात सुनकर वृद्धा की हिम्मत बँधी । उसने कहा, ‘‘मेरा बेटा बीमार है । वही मेरे जीवन का आधार है । जब वह कमाकर लाता है, तब हम दोनों माँ-बेटे को भोजन मिलता है । वह बहुत दिनों से बीमार है । घर पर खाने के लिए कुछ भी नहीं है । आज जब मेरी नज़र इन पके हु्ए बेरों पर पड़ी, तो सोचा कि अपने लाला को ये मीठे बेर खिलाऊँगी । जब मैंने बेर तोड़ने के लिए पत्थर फेंका, तो वह सीधे जाकर आपको लगा । हे राजा ! मुझसे भूल हो गई, मुझे माफ कर दीजिए । अगर आप मुझे पकड़ कर ले जाएंगे, तो मेरे पुत्र की देखभाल कौन करेगा ?’’ राजा कुछ देर चुप रहे । फिर उन्होंने अपने मंत्री को आदेश दिया- ‘‘ इस वृद्धा को छोड़ दो ।’’ साथ ही उन्होंने उस वृद्धा को एक हजार रुपये देने की घोषणा की । राजा की बात सुनकर सबको आश्चर्य हुआ । जब मंत्री से रहा न गया, तो उसने राजा से कहा, ‘‘राजन ! माफ करें । आपके न्याय के रहस्य को समझ न सका । हम सब तो यही सोच रहे थे कि आप वृद्धा को सजा देंगे, किन्तु आपने तो रुपये देने की घोषणा की है ! राजा बोले, ‘‘वृद्धा की बात सुनकर मेरी नज़र बेर के पेड़ पर गई । उसे देखकर मेरे मन में बड़ा शुभ विचार आया। मैं सोचने लगा कि इन वृक्षों-सा सहनशील और परोपकारी कोई नहीं है। हमें भी इन वृक्षों-सा ही सहनशील और परोपकारी बनना चाहिए । हम सब इसके फल को पाने के लिए पत्थर चलाते हैं । इन्हें कष्ट देते हैं । किन्तु ये वृक्ष हमें माफ कर हमारी भलाई करते हैं ।

जब यह वृक्ष पत्थर की चोट खाकर भी मीठे फल दे सकता है, तो क्या मुझे इस ज़रूरतमंद वृद्धा को खाली हाथ लौटा देना चाहिए ? कहो, ठीक रहा मेरा न्याय !’’ कहो बच्चों ! कैसी लगी तुम्हें यह कहानी ? क्या तुम बता सकते हो कि यह कहानी तुम्हारे लिए श्री महाराज जी का क्या संदेश लेकर आयी है ? तुम वृक्ष से सहनक्शीलता का गुण सीखो । सहनशीलता का अर्थ केवल दिखावे की सहनशीलता नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ है कि परिस्थिति कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो, हमें परेशान या क्रोधित नहीं होना है । शान्त रहने का अभ्यास करना है । कोई भी हमें कितना ही भला-बुरा कहे, हमारी निंदा करे, उसका जवाब नहीं देना है । चुप रह जाना है । एक तरकीब आजमाओ- सदा ही श्री महाराज जी की बात याद रखा करो कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं। सामने वाले के द्वारा हमारे शरीर की निंदा की जा रही है । उसे गाली दी जा रही है, हमारी आत्मा को नहीं ! जब एक शरीर दूसरे शरीर की निंदा करता है, तो उससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता है । हाँ, यदि उसे सुनकर हमें गुस्सा आ गया, तो हमारा मन अवश्य गंदा हो जाएगा और सामने वाले का गुस्सा भी बढ़ेगा । कहो, श्री महाराज जी की इस बात को तुम सदा याद रखोगे न । तुम्हें वृक्ष से सहनशीलता सीखनी है । याद है न ! श्री महाराज जी कहा करते हैं- ‘‘अभ्यास से सबकुछ संभव है ।’’ क्या वृक्ष को उस वृद्धा माँ के पत्थर से चोट नहीं लगी ? क्या राजा ने पत्थर की चोट नहीं खाई ? वृक्ष ने चोट खाकर भी वृद्धा माँ को फल दिया, जिससे उसकी और उसके बेटे की भूख मिटेगी। फिर राजा को भी देखो ! उन्होंने क्या किया ? घटी घटना पर गहराई से विचार किया। परिणाम क्या हुआ ? चोट लगने पर भी उनका ध्यान वृक्ष की परोपकारिता और सहनशीलता पर गया। क्यों ? क्योंकि उन्होंने अपने हृदय में बैठे भगवान से बात की । तुम भी परेशानी आने पर अपने अंदर बैठे भगवान से बात करके ज़रूर देखो !

कहो, श्री महाराज जी की इस बात को तुम सदा याद रखोगे ना । तुम्हें वृक्ष से सहनशीलता सीखनी है । याद है न ! श्री महाराज जी कहा करते हैं- ‘‘अभ्यास से सबकुछ संभव है ।’’ क्या वृक्ष को उस वृद्धा माँ के पत्थर से चोट नहीं लगी ? क्या राजा ने पत्थर की चोट नहीं खाई ? वृक्ष ने चोट खाकर भी वृद्धा माँ को फल दिया, जिससे उसकी और उसके बेटे की भूख मिटेगी। फिर राजा को भी देखो ! उन्होंने क्या किया ? घटी घटना पर गहराई से विचार किया। परिणाम क्या हुआ ? चोट लगने पर भी उनका ध्यान वृक्ष की परोपकारिता और सहनशीलता पर गया। क्यों ? क्योंकि उन्होंने अपने हृदय में बैठे भगवान से बात की । तुम भी परेशानी आने पर अपने अंदर बैठे भगवान से बात करके ज़रूर देखो !

सदा ही श्री महाराज जी की बात याद रखा करो कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं। सामने वाले के द्वारा हमारे शरीर की निंदा की जा रही है । उसे गाली दी जा रही है, हमारी आत्मा को नहीं ! जब एक शरीर दूसरे शरीर की निंदा करता है, तो उससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता है । हाँ, यदि उसे सुनकर हमें गुस्सा आ गया, तो हमारा मन अवश्य गंदा हो जाएगा और सामने वाले का गुस्सा भी बढ़ेगा ।

कहो, श्री महाराज जी की इस बात को तुम सदा याद रखोगे न । तुम्हें वृक्ष से सहनशीलता सीखनी है । याद है न ! श्री महाराज जी कहा करते हैं- ‘‘अभ्यास से सबकुछ संभव है ।’’ क्या वृक्ष को उस वृद्धा माँ के पत्थर से चोट नहीं लगी ? क्या राजा ने पत्थर की चोट नहीं खाई ? वृक्ष ने चोट खाकर भी वृद्धा माँ को फल दिया, जिससे उसकी और उसके बेटे की भूख मिटेगी। फिर राजा को भी देखो ! उन्होंने क्या किया ? घटी घटना पर गहराई से विचार किया। परिणाम क्या हुआ ? चोट लगने पर भी उनका ध्यान वृक्ष की परोपकारिता और सहनशीलता पर गया। क्यों ? क्योंकि उन्होंने अपने हृदय में बैठे भगवान से बात की । तुम भी परेशानी आने पर अपने अंदर बैठे भगवान से बात करके ज़रूर देखो !

सदा ही श्री महाराज जी की बात याद रखा करो कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं। सामने वाले के द्वारा हमारे शरीर की निंदा की जा रही है । उसे गाली दी जा रही है, हमारी आत्मा को नहीं ! जब एक शरीर दूसरे शरीर की निंदा करता है, तो उससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता है । हाँ, यदि उसे सुनकर हमें गुस्सा आ गया, तो हमारा मन अवश्य गंदा हो जाएगा और सामने वाले का गुस्सा भी बढ़ेगा ।

कहो, श्री महाराज जी की इस बात को तुम सदा याद रखोगे न । तुम्हें वृक्ष से सहनशीलता सीखनी है । याद है न ! श्री महाराज जी कहा करते हैं- ‘‘अभ्यास से सबकुछ संभव है ।’’ क्या वृक्ष को उस वृद्धा माँ के पत्थर से चोट नहीं लगी ? क्या राजा ने पत्थर की चोट नहीं खाई ? वृक्ष ने चोट खाकर भी वृद्धा माँ को फल दिया, जिससे उसकी और उसके बेटे की भूख मिटेगी। फिर राजा को भी देखो ! उन्होंने क्या किया ? घटी घटना पर गहराई से विचार किया। परिणाम क्या हुआ ? -चोट लगने पर भी उनका ध्यान वृक्ष की परोपकारिता और सहनशीलता पर गया। क्यों ? -क्योंकि उन्होंने अपने हृदय में बैठे भगवान से बात की । तुम भी परेशानी आने पर अपने अंदर बैठे भगवान से बात करके ज़रूर देखो !

दूध और खून

बच्चों ! गुरु नानक साहब का नाम तुमलोगों ने अवश्य सुना होगा । ये सिक्खों के गुरु हैं । गुरुनानक जी गाँव-गाँव में जाकर लोगों को सही राह पर चलने की सीख दिया करते । ये सबको समझाते कि भगवान् ने ही हमें जीवन दिया है, वे ही हमारा पालन-पोषण करते हैं । इन्हें सदा हमारी चिन्ता रहती है । इसलिए उस परम पिता से हमें बहुत प्यार करना चाहिए और उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए । एक बार ये एक गरीब बढ़ई के घर पहुँचे । उसका नाम लालो था । उसे भगवान से बहुत प्यार था । बढ़ई ने गुरुनानक जी को अपने घर पर रुकने की विनती की । उसके अति विनीत व्यवहार से प्रसन्न होकर ये एक दिन के लिए उसी के घर में रुक गए । उसी गाँव में एक धनी व्यक्ति रहता था, जिसका नाम था मलिक भागो । उसने एक दिन अपने गाँव वालों को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया । तरह-तरह के व्यंजन और भोजन बनवाए गए । गाँव के सब लोग भोजन के लिए उसके घर आए । सबने मलिक भागो की बहुत प्रशंसा की । मलिक भागो बहुत प्रसन्न हुआ । तभी उसकी नज़र अपने नौकर पर पड़ी । भागो ने उससे यह पता करने को कहा कि गाँव में कोई ऐसा तो नहीं रहा, जिसने भोजन नहीं किया हो । वापस आकर नौकर ने मलिक भागो को बताया कि लालो के घर में एक संत ठहरे हैं, सिर्फ वे ही भोजन के लिए नहीं पधारे हैं । भागो स्वयं उन्हें बुलाने के लिए पहुँचा और उसने पूछा –‘ आप मेरे घर भोजन करने के लिए क्यों नहीं पधारे ?’ गुरु नानक जी ने कहा— ‘अब तो चल रहा हूँ न !’ गुरु नानक जी के सामने तरह-तरह के व्यंजन और भोजन रखे गए । गुरु नानक जी ने लालो को बुलाया और उसे अपने घर से रोटी लाने को कहा । वह घर गया और रोटी लेकर आया । अब गुरुनानक देव जी ने लालो की रोटी को अपने हाथों में रखकर दबाया । उसे दबाते ही उससे दूध की धारा निकलने लगी । फिर गुरु नानकदेव जी ने मालिक भागो की रोटी भी हाथ में लेकर दबाई, उससे खून टपकने लगा । यह देखकर सब चकित रह गए । गुरुनानक जी ने भागो से कहा— ‘देखो ! तुमने गरीबों को लूटा है, इसलिए तुम्हारी रोटी से खून टपक रहा है, जबकि लालो की रोटी ईमानदारी की है, अत: उससे दूध टपकता है । भागो गुरुनानकदेव जी के चरणों पर गिर पड़ा और उसने गुरुजी से क्षमा माँगी । उसी दिन उसने संकल्प लिया कि अब वह केवल मेहनत की कमाई ही खाएगा । उसने सदा के लिए दूसरों को कष्ट देना छोड़ दिया । वह विपत्ति की घड़ी में दूसरों की सदा मदद किया करता । अब लोग उससे बहुत प्यार करने लगे । जानते हो बच्चों ! श्री महाराज जी क्या कहा करते हैं ? वे कहते हैं कि भगवान का सदा स्मरण करने से तुम ऐसा महसूस करोगे कि वे सदा तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे रक्षक हैं और तुम्हारे सभी अच्छे-बुरे कार्यों के निरीक्षक भी हैं । फिर तुमसे कभी कोई गलत काम नहीं होगा । भगवान् को भूलने के कारण ही हमारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं और हममें दुर्गुण आते हैं । भगवान् की संतान होने के नाते सब में सद्गुणों का भंडार छिपा पड़ा है, जरूरत इस बात की है कि कोई उससे हमारा परिचय करवा दे । यह कौन कर सकता है ? जो स्वयं सर्वगुण संपन्न हो यानी सच्चा सन्त । वे ही ऐसा कर सकते हैं, हमें अपने अन्दर छिपे सद्गुण की खान का परिचय करवा सकते हैं ।

जानते हो बच्चों ! श्री महाराज जी क्या कहा करते हैं ? वे कहते हैं कि भगवान का सदा स्मरण करने से तुम ऐसा महसूस करोगे कि वे सदा तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे रक्षक हैं और तुम्हारे सभी अच्छे-बुरे कार्यों के निरीक्षक भी हैं । फिर तुमसे कभी कोई गलत काम नहीं होगा । भगवान् को भूलने के कारण ही हमारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं और हममें दुर्गुण आते हैं । भगवान् की संतान होने के नाते सब में सद्गुणों का भंडार छिपा पड़ा है, जरूरत इस बात की है कि कोई उससे हमारा परिचय करवा दे । यह कौन कर सकता है ? जो स्वयं सर्वगुण संपन्न हो यानी सच्चा सन्त । वे ही ऐसा कर सकते हैं, हमें अपने अन्दर छिपे सद्गुण की खान का परिचय करवा सकते हैं ।

हमारे बच्चे, हमारे भविष्य

जानते हो बच्चों ! श्री महाराज जी क्या कहा करते हैं ? वे कहते हैं कि भगवान का सदा स्मरण करने से तुम ऐसा महसूस करोगे कि वे सदा तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे रक्षक हैं और तुम्हारे सभी अच्छे-बुरे कार्यों के निरीक्षक भी हैं । फिर तुमसे कभी कोई गलत काम नहीं होगा । भगवान् को भूलने के कारण ही हमारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं और हममें दुर्गुण आते हैं । भगवान् की संतान होने के नाते सब में सद्गुणों का भंडार छिपा पड़ा है, जरूरत इस बात की है कि कोई उससे हमारा परिचय करवा दे । यह कौन कर सकता है ? जो स्वयं सर्वगुण संपन्न हो यानी सच्चा सन्त । वे ही ऐसा कर सकते हैं, हमें अपने अन्दर छिपे सद्गुण की खान का परिचय करवा सकते हैं ।

Our Kids, Our Future.

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